भृगु ऋषि द्वारा त्रिदेवों की परीक्षा:

 





भृगु ऋषि द्वारा त्रिदेवों की परीक्षा: 

धैर्य और क्षमा की महागाथा

प्राचीन काल की बात है, सरस्वती नदी के तट पर ऋषियों और मुनियों का एक विशाल सम्मेलन हो रहा था। चर्चा का विषय अत्यंत गूढ़ था—"त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में सबसे श्रेष्ठ और उपासना के योग्य कौन है?"

ऋषियों के बीच मतभेद था। कोई ब्रह्मा जी की सृजन शक्ति का गुणगान कर रहा था, तो कोई शिव की वैराग्यपूर्ण महानता का। अंततः यह निर्णय लिया गया कि तीनों देवों की परीक्षा ली जाए। इस कठिन कार्य के लिए महर्षि भृगु को चुना गया, जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे और अत्यंत क्रोधी स्वभाव के लिए जाने जाते थे।

1. ब्रह्मा जी की परीक्षा: 











पुत्र का मोह और अहंकार :- भृगु ऋषि सर्वप्रथम अपने पिता ब्रह्मा जी के पास सत्यलोक पहुँचे। उन्होंने जानबूझकर ब्रह्मा जी को न तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। वे उनके सामने एक उद्दंड व्यक्ति की भाँति खड़े हो गए।

ब्रह्मा जी अपने पुत्र के इस व्यवहार से अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने इसे अपना अपमान समझा। यद्यपि भृगु उनके पुत्र थे, फिर भी ब्रह्मा जी ने उन्हें दंड देने के लिए अपना क्रोध प्रकट किया। भृगु ऋषि ने देखा कि ब्रह्मा जी रजोगुण से प्रभावित हैं और उनमें अभी भी अहंकार शेष है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि जो स्वयं क्रोध के वश में हो, वह सर्वश्रेष्ठ कैसे हो सकता है?

2. भगवान शिव की परीक्षा: 

मर्यादा और विनाश का भय :- इसके पश्चात भृगु ऋषि कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से मिलने पहुँचे। शिव और पार्वती उस समय एकांत में थे। भृगु ने बिना अनुमति के उनके कक्ष में प्रवेश करने का प्रयास किया।

भगवान शिव, जो अपने भक्त और भाई (ब्रह्मापुत्र) को देखकर गले लगाने के लिए बढ़े, भृगु ने उन्हें रोक दिया और कहा— "हे महादेव! आप भस्म रमाते हैं और अपवित्र रहते हैं, मैं आपका स्पर्श नहीं करूँगा।"

यह सुनकर शिव अत्यंत कुपित हो गए। उन्होंने अपना त्रिशूल उठा लिया और भृगु का वध करने के लिए उद्यत हुए। माता पार्वती ने बीच-बचाव कर उन्हें शांत किया। भृगु ऋषि वहाँ से चले गए, यह समझकर कि शिव तमोगुण के अधीन हैं और शीघ्र ही अपना आपा खो देते हैं।

3. वैकुंठ की घटना: 











भगवान विष्णु की छाती पर प्रहार

अंत में, भृगु ऋषि क्षीर सागर स्थित वैकुंठ लोक पहुँचे। वहाँ भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। भृगु ने देखा कि विष्णु योगनिद्रा में हैं।

भृगु ने इसे विष्णु का छल समझा। उन्हें लगा कि विष्णु अतिथि के आगमन को जानकर भी सोने का नाटक कर रहे हैं। क्रोध के आवेश में आकर, भृगु ऋषि ने बिना सोचे-समझे अपनी दाईं टाँग उठाई और भगवान विष्णु की छाती पर ज़ोरदार लात (पद-प्रहार) मार दी।

यह दृश्य देखकर पूरा ब्रह्मांड कांप उठा। लक्ष्मी जी स्तब्ध रह गईं। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने इतिहास बदल दिया।

4. विष्णु की क्षमा और विनम्रता का पराकाष्ठा










लात लगते ही भगवान विष्णु की आँखें खुल गईं। वे तुरंत अपने आसन से उठे, क्रोध करना तो दूर, उन्होंने भृगु ऋषि के चरणों को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया। विष्णु ने अत्यंत मृदु स्वर में कहा:

"हे ऋषिवर! क्षमा करें। मुझे आपके आगमन का ज्ञान नहीं हुआ। मेरी छाती वज्र के समान कठोर है और आपके कोमल चरणों में चोट लग गई होगी। कृपया मुझे अपने चरणों की सेवा करने का अवसर दें।"

भगवान विष्णु स्वयं भृगु के पैरों को सहलाने लगे। विष्णु की इस अपार सहनशीलता, करुणा और अहंकारहीनता को देखकर भृगु ऋषि का हृदय द्रवित हो उठा। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्हें बोध हुआ कि सच्ची महानता शक्ति के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि क्षमा और धैर्य में है।


5. लक्ष्मी जी का क्रोध और वैकुंठ का त्याग

जहाँ विष्णु ने भृगु को क्षमा कर दिया, वहीं माता लक्ष्मी (भृगु की पुत्री मानी जाती हैं, लेकिन यहाँ वे विष्णु की पत्नी स्वरूप में थीं) इस अपमान को सहन न कर सकीं। उन्होंने भृगु को श्राप दिया कि भविष्य में वे कभी ब्राह्मणों के घर नहीं टिकेंगी (अर्थात ब्राह्मण निर्धन रहेंगे)।

लक्ष्मी जी भगवान विष्णु से भी रुष्ट हो गईं। उन्होंने कहा, "स्वामी, जिस वक्षस्थल (छाती) पर मेरा वास है, उस पर एक साधारण मनुष्य ने लात मारी और आपने उसे दंड देने के बजाय उसके पैर सहलाए? मैं अब यहाँ नहीं रह सकती।"

अपमानित महसूस करते हुए माता लक्ष्मी ने वैकुंठ त्याग दिया और पृथ्वी पर जाकर कोल्हापुर में तपस्या करने लगीं। लक्ष्मी जी के बिना वैकुंठ श्रीहीन हो गया, और इसी के परिणामस्वरूप बाद में भगवान विष्णु को वेंकटेश्वर (तिरुपति) के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेना पड़ा ताकि वे लक्ष्मी (पद्मावती) को पुनः प्राप्त कर सकें।











6. भृगु का निर्णय:

विष्णु ही श्रेष्ठ हैं

भृगु ऋषि वापस ऋषियों के सम्मेलन में पहुँचे और सारा वृत्तांत सुनाया। उन्होंने स्पष्ट किया:

ब्रह्मा जी रजोगुण (अहंकार) के कारण पूर्ण नहीं हैं।

शिव जी तमोगुण (क्रोध) के कारण श्रेष्ठता की कसौटी पर नहीं उतरते।

भगवान विष्णु ही 'सत्वगुण' के प्रतीक हैं। वे सर्वशक्तिमान होकर भी परम शांत और क्षमाशील हैं।

ऋषियों ने सर्वसम्मति से भगवान विष्णु को 'त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ' स्वीकार किया। तब से विष्णु को 'भृगु-लांछन' (भृगु के पदचिह्न को धारण करने वाला भी कहा जाने लगा। विष्णु ने उस पद-चिह्न को अपनी छाती पर एक आभूषण (श्रीवत्स) की तरह धारण किया ताकि भक्त याद रख सकें कि वे अपने भक्तों और ब्राह्मणों का कितना सम्मान करते हैं।


राहुल कुमार 

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