अश्वत्थामा को श्राप

 








अश्वत्थामा को भगवान श्री कृष्ण द्वारा दिए गए श्रा की कथा भारतीय पौराणिक इतिहास और महाभारत के सबसे गंभीर प्रसंगों में से एक है। यह कथा केवल एक दंड की नहीं, बल्कि कर्म, अहंकार और उसके भयावह परिणामों की सीख है।

​नीचे इस कथा को विस्तृत रूप से विभिन्न शीर्षकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है:

​1. अश्वत्थामा का परिचय और उसकी शक्ति









अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचार्य और माता कृपी के पुत्र थे। वह साक्षात भगवान शिव के अंशावतार माने जाते थे। उनके जन्म के समय उनके कंठ से अश्व (घोड़े) जैसी ध्वनि निकली थी, जिसके कारण उनका नाम 'अश्वत्थामा' पड़ा।
  • दिव्य मणि: जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक पर एक अमूल्य और दिव्य मणि थी। यह मणि उसे भूख, प्यास, थकान, अस्त्र-शस्त्र, व्याधि और देवताओं के भय से मुक्त रखती थी।
  • अस्त्र ज्ञान: द्रोणाचार्य के पुत्र होने के नाते उन्हें ब्रह्मास्त्र सहित सभी घातक अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त था। यद्यपि वह पांडवों के भी मित्र थे, लेकिन पिता के प्रति निष्ठा और दुर्योधन की मित्रता के कारण उन्होंने कौरवों का पक्ष चुना।

​2. प्रतिशोध की ज्वाला: महाभारत युद्ध का अंत

​महाभारत का युद्ध समाप्त होने की कगार पर था। भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे महारथी वीरगति प्राप्त कर चुके थे। भीम ने गदा युद्ध में दुर्योधन की जंघा तोड़ दी थी और वह मरणासन्न अवस्था में पड़ा था। अपने मित्र की यह दशा देख अश्वत्थामा क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में जल उठा।

​उसने प्रण लिया कि वह पांडवों का समूल नाश कर देगा। रात्रि के समय, जब युद्ध के नियम लागू नहीं होते थे, अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर पर आक्रमण करने की योजना बनाई।

​3. रात्रि का भीषण नरसंहार

अश्वत्थामा ने रात्रि के अंधकार में पांडवों के शिविर पर हमला किया। उस समय पांडव शिविर में नहीं थे, वे भगवान कृष्ण के साथ कहीं और रुके हुए थे।

  • पांडवों के पुत्रों का वध: अश्वत्थामा ने सो रहे पांडवों के पांचों पुत्रों (द्रौपदी के पुत्रों) को पांडव समझकर उनका वध कर दिया।
  • धृष्टद्युम्न की हत्या: उसने अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए धृष्टद्युम्न को भी मार डाला। जब उसे ज्ञात हुआ कि उसने पांडवों को नहीं बल्कि उनके पुत्रों को मारा है, तो उसे अपनी भूल का आभास हुआ, लेकिन प्रतिशोध का पागलपन अभी खत्म नहीं हुआ था।






​4. ब्रह्मास्त्र का प्रयोग और उत्तरा का गर्भ

​जब पांडवों को अपने पुत्रों की हत्या का पता चला, तो वे क्रोधित होकर अश्वत्थामा का पीछा करने लगे। अर्जुन और अश्वत्थामा का आमना-सामना हुआ।

​अश्वत्थामा ने स्वयं को संकट में देख पांडवों के विनाश के लिए ब्रह्मास्त्र का आह्वान किया। जवाब में अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। दो ब्रह्मास्त्रों के टकराने से सृष्टि का विनाश निश्चित था, इसलिए ऋषियों के कहने पर अर्जुन ने अपना अस्त्र वापस ले लिया।

​लेकिन अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र वापस लेना नहीं आता था। उसने अपनी कुटिलता और घृणा में आकर उस अस्त्र की दिशा अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दी, ताकि पांडवों का वंश ही समाप्त हो जाए।

​5. भगवान श्री कृष्ण का हस्तक्षेप






​अश्वत्थामा के इस जघन्य कृत्य को देखकर भगवान श्री कृष्ण अत्यंत क्रोधित हो उठे। उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु (परीक्षित) की रक्षा के लिए श्री कृष्ण ने अपनी दैवीय शक्ति का प्रयोग किया और अस्त्र को शांत किया।

​इसके बाद, श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को उसके पापों का फल देने का निर्णय लिया। यह क्षण महाभारत के सबसे भयानक दंडों में से एक के रूप में जाना जाता है।

​6. श्री कृष्ण का भयानक श्राप

​भगवान श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को संबोधित करते हुए कहा कि उसने न केवल सोए हुए बालकों की हत्या की है, बल्कि एक अजन्मे शिशु पर प्रहार करके मानवता की सारी सीमाएं लांघ दी हैं।

​श्री कृष्ण ने उसे निम्नलिखित श्राप दिए:

  • अनंत जीवन का कष्ट: "तुम आने वाले तीन हजार वर्षों तक इस पृथ्वी पर निर्जन स्थानों में भटकते रहोगे।"
  • शारीरिक पीड़ा: "तुम्हारे शरीर से हमेशा रक्त और पीब (pus) की दुर्गंध आती रहेगी। तुम अनेक रोगों से ग्रस्त रहोगे, लेकिन मृत्यु तुम्हें नहीं आएगी।"
  • सामाजिक बहिष्कार: "तुम किसी भी मनुष्य से बात नहीं कर सकोगे और न ही कोई समाज तुम्हें स्वीकार करेगा। तुम जंगल और श्मशान की खाक छानोगे।"
  • मणि का त्याग: श्री कृष्ण के आदेश पर पांडवों ने अश्वत्थामा के माथे से वह दिव्य मणि निकाल ली। मणि निकलने के बाद वहां एक गहरा घाव बन गया, जो कभी न भरने वाला था।

​7. अश्वत्थामा की नियति और वर्तमान मान्यताएं








श्राप मिलने के बाद अश्वत्थामा का तेज समाप्त हो गया और वह एक प्रेतवत प्राणी बनकर घने जंगलों की ओर चला गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अश्वत्थामा आज भी जीवित है और अपने पापों का प्रायश्चित कर रहा है।

  • असीरगढ़ का किला (मध्य प्रदेश): जनश्रुतियों के अनुसार, बुरहानपुर के असीरगढ़ किले के शिव मंदिर में अश्वत्थामा आज भी रोज सुबह पूजा करने आता है। वहां के स्थानीय लोग बताते हैं कि शिवलिंग पर रोज सुबह ताजे फूल और चंदन अर्पित मिलता है।
  • नर्मदा तट: कई साधु-संतों ने दावा किया है कि उन्होंने नर्मदा नदी के किनारों पर एक बहुत ऊंचे कद के व्यक्ति को देखा है, जिसके माथे पर गहरा घाव है और वह असहनीय दर्द में रहता है।

अश्वत्थामा का श्राप भारतीय संस्कृति में 'अमरता के अभिशाप' का प्रतीक है। यह याद दिलाता है कि मृत्यु हमेशा बुरी नहीं होती; कभी-कभी जीवित रहना मृत्यु से भी अधिक कष्टकारी हो सकता है यदि आपके कर्म अधर्मी हों। भगवान कृष्ण का यह न्याय ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों को मर्यादा सिखाने के लिए आवश्यक था।

राहुल कुमार 

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